Jhurangu, Pauri Garhwal, Uttarakhand- Mr. Amit Bhadula


My Village Jhurangu (झुड़ंगू)

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ग्राम झुडगू ,पोस्ट ऑफिस चामसैन विकासखंड NAINIDANDA तहसील धुमाकोट पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड 
Village Jhurangu PO CHAMSAIN BLOCK NAINIDANDA TEHSIL-DHUMAKOT district Pauri Garhwal Uttarakhand 

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यह स्मृति-लेख हमारे परिवार की पहचान, मूल्य और परंपरा का जीवित दस्तावेज़ है।   🌿
📍 झुरंगु गांव – झुरंगु गांव – प्रकृति की गोद में बसा एक अनुपम लोक, शिवालिक पहाड़ियों के मध्य, बूंगी मां के छत्र छाया में बसा झुरंगु एक ऐसा गांव है मानो प्रकृति ने अपनी कोमल भावनाओं को आकार देकर उसे धरती पर उतार दिया हो। चारों ओर फैले घने वन, लंबे चौड़े खेत, हरियाली से लिपटी ढलानें और शीतल हवाओं की सरसराहट यहां के वातावरण को जीवंत बना देती हैं।
प्रातःकाल जब सूर्य की प्रथम किरणें पर्वतों के आंचल से झांकती हैं, तो पूरा गांव स्वर्णिम आभा में नहा उठता है। पक्षियों का मधुर कलरव, पेड़ों की मद्धिम थिरकन और दूर तक पसरी निस्तब्धता—ये सब मिलकर झुरंगु को एक अद्वितीय संगीत प्रदान करते हैं।
यह गांव केवल एक स्थान नहीं, बल्कि सरलता, शांति और परंपरा का सजीव स्वरूप है। यहां का जीवन प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर चलता है, जहां आधुनिकता की चकाचौंध से दूर, सादगी और संतोष ही सबसे बड़ा धन है। झुरंगु, वास्तव में, उस सुकून का नाम है जिसकी तलाश में मनुष्य अक्सर भटकता रहता है।
गांव का प्राचीन इतिहास 
I was able to compose this article as a humble tribute to the sacred memory of my beloved grandfather, Late Shri Pitambar Datt Bhadula Ji, drawing upon the guidance, genealogical record, and affectionate support I received at his residence in Manpur, Kotdwar. Even after his retirement as Chief from Bank of India, he remained a guiding light, enriching society with his wisdom, experience, and enduring commitment to knowledge.

The depth and dignity of his personality are beyond the confines of words. He was not merely an individual, but a living embodiment of values, discipline, and inspiration. In my view, personalities of such stature are exceedingly rare, gracing the earth only on special occasions.

One of his most remarkable contributions was the compilation of a comprehensive genealogical book of the Bhadula family, which he thoughtfully shared with all its members. Through this invaluable work, the younger generation has been able to connect with its roots and gain a deeper understanding of its ancestral heritage. It is through his writings that we have come to know and appreciate the legacy of our forebears.

His efforts to acquaint the new generation with their history, संस्कार (values), and cultural roots are truly unforgettable. By preserving the memories of the past, he transformed them into a wellspring of inspiration for the present and the future. His life itself stands as a timeless legacy—one that will continue to guide and inspire generations to come.
यह लेख मैं अपने गांव के परम प्रिय दादा जी, स्वर्गीय श्री पीतांबर दत्त भदूला जी की पावन स्मृतियों को समर्पित करते हुए, उनके मानपुर, कोटद्वार स्थित निवास पर प्राप्त मार्गदर्शन, वंशावली पुस्तक एवं स्नेहिल के आधार पर लिख सका हूँ। वे बैंक ऑफ इंडिया से चीफ पद से सेवानिवृत्ति के पश्चात भी अपने अनुभव और ज्ञान से समाज को आलोकित करते रहे। 
उनके व्यक्तित्व की गरिमा और विस्तार का वर्णन शब्दों में समेट पाना अत्यंत कठिन है। वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि मूल्यों, अनुशासन और प्रेरणा के जीवंत प्रतीक थे। मेरे विचार में उनके समान व्यक्तित्व विरले ही इस धरा पर जन्म लेते हैं।
उनके द्वारा Bhadula परिवार की वंशावली की एक किताब भी तैयार की गई, जो संपूर्ण bhadula परिवार को बांटी गई जिससे नई पीढ़ी को भी अपने पूर्वजों का इतिहास की जानकारी प्राप्त हो सके। उन्हीं की लिखी पुस्तक से ही हमे अपने पूर्वजों के इतिहास के बारे में ज्ञात होता है।
नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों के इतिहास, संस्कारों और जड़ों से परिचित कराने में उनका योगदान अविस्मरणीय है। उनके सतत प्रयासों ने न केवल अतीत की स्मृतियों को संजोकर रखा, बल्कि उन्हें वर्तमान के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बना दिया। उनका जीवन स्वयं एक ऐसी धरोहर है, जो आने वाली पीढ़ियों को सदैव मार्गदर्शन प्रदान करती रहेगी।

इतिहास.......

हमारे पूज्य परदादा श्री कृतराम जी के पूर्वजों के नाम तथा उनके मूल निवास का पता न होने के कारण यह वंशावली श्री कृतराम जी के समय से शुरू की जा रही है।

लोगों का कहना है कि हमारे परदादा जी दो भाई श्री कीडू पांडे और श्री लल्लू पांडे सर्वप्रथम जिला गढ़वाल पट्टी-बूंगी के अंतर्गत ग्राम- - झुड़ंगू पहुँचे। उनके पास काफी धन था। ग्राम झुड़ंगू में आने के पश्चात दोनों भाईयों ने सोचा कि एक जगह रहकर शायद हम विकास न कर सकें इसलिए उन्होंने निर्णय लिया कि बड़ा भाई कीडू पांडे उर्फ श्री कृतराम झुड़ंगू में रहेंगे और छोटा भाई लल्लू पांडे उर्फ श्री लालमणि ग्राम महेली पट्टी- इडियाकोट तल्ला जिला पौड़ी गढ़वाल में रहेंगे।
श्री कृतराम जी एक अनुभवी, कर्मठ एवं स्वावलम्बी व्यक्ति थे वे किसी के सामने झुकना नहीं चाहते थे। वह गरीबों की सेवा करने हेतु सदा तत्पर रहते थे। जब उनका क्षेत्र के लोगों से सम्पर्क हुआ तो लोगों ने उन्हें कभी कृतराम जी के नाम से नहीं पुकारा, वह उन्हें माता -पिता के दिए नाम कीडू जी के नाम से ही पुकारा करते थे और उन्हें भी इसी नाम से प्यार था । इसीलिए वह अपना नाम कीडू ही कहलाना पसन्द करते थे।
उनका "कीडू" नाम उन्हें ठीक ही मिला। कहा भी है 'जथो नाम तथो गुण' । कीड़ों (केंचुओं) को मिट्टी प्यारी होती है। इसी प्रकार हमारे परदादा जी श्री कीडू जी को मिट्टी से प्यार था। उन्होंने अपनी धन सम्पत्ति का सदुपयोग किया और जमीन खरीदने में धन को व्यय कर अपने कार्यकाल में ग्राम झुड़ंगू के अतिरिक्त पट्टी - बूंगी में ग्राम चाम सम्पूर्ण, ग्राम मंगेड़ी वल्ली सम्पूर्ण, ग्राम जमूण संपूर्ण ग्राम-कालाखाण्ड लग्गा झुड़ंगू सम्पूर्ण, ग्राम घोड़ाखांद एक भाग, ग्राम वसांणी लग्गा झुड़ंगू सम्पूर्ण, ग्राम कुभीसैंण लग्गा झुड़ंगू सम्पूर्ण, ग्राम बाड़ाधार सम्पूर्ण, ग्राम खड़ीला लग्गा झुड़ंगू सम्पूर्ण, ग्राम बुढाकोट सम्पूर्ण, ग्राम बियासी पल्ली का कुछ हिस्सा, ग्राम जालीखांद आदि तथा इड़ियाकोट में छ: रुपये रकमी जमीन ग्राम चैबाड़ा तथा एक-दो जगह और खरीद कर एक बहुत बड़ा साम्राज्य बनाया और पट्टी बूंगी के थोकदारों की थोकदारी से अपने उपरोक्त समस्त गांवों को तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर के द्वारा मुक्त कराकर थोकदारी का दर्जा हासिल किया। यद्यपि इसका उन्हें कोई मालिकाना नहीं मिलता था। वह गरीबों का हमेशा ध्यान रखते थे। जब उन्होंने देखा कि उनके क्षेत्र की जनता को वन विभाग के कर्मचारी तंग करते हैं तो उन्होंने अपने ग्राम के पांच मील रेडियस के क्षेत्र में जन-समाज को राहत पहुंचाने हेतु व्यवस्था की व ग्राम बसांणी और ग्राम कुम्भीसैंण के बीच एक बहुत बड़ा पत्थर जिसमें लोग खाना पका सके व सो
सकें पर वन विभाग के अन्दर अपना अधिकार करा दिया ताकि लोग बांस आदि कास्तकारी का सामान आसानी से ला सकें व उन्हें कोई परेशान न कर सके। मंदाल नदी के किनारे घने जंगल के बीच आज भी वह पत्थर कीडू पांडे का पत्थर कहलाता है ।

श्री कृताराम जी ने वन विभाग के अन्दर मंदाल नदी व रामगंगा नदी के किनारे हमारे जो बाड़ाधार व कालाखांड गांव पड़ते हैं उनके नाम से मछली मारने का हक प्राप्त कर जन-समाज को राहत दिलाई। उन्हें रिजर्व फॉरेस्ट के अन्दर भैंसे, छः ऊंट तथा एक हाथी के चुगान का हक प्राप्त था। कहते हैं उनकी अनेक पत्नियाँ थी जो अलग-अलग गांवों में रहकर वहां का कार्यभार संभालती थी। किन्तु सन्तान केवल एक से ही हुई ।

श्री कृतराम जी के पांच पुत्र थे। जिनके नाम क्रमश: सर्वश्री देवराम जी, लोकमणि जी, दत्तराम जी, उपेन्द्रदत्त जी तथा चन्द्रमणि जी थे। पांचों भाई अधिक समय तक साथ नहीं रह सके और इनमें से श्री देवराम जी, श्री लोकमणि जी तथा श्री दत्तराम जी अलग-अलग हो गए किन्तु श्री उपेन्द्रदत्त जी व श्री चन्द्रमणि जी काफी समय तक एक साथ रहे।
चूंकि श्री उपेन्द्र दत्त जी उस समय फॉरेस्ट रेंजर थे वह अपनी सर्विस के दौरान बाहर रहे इसलिए घर का सारा कार्यभार श्रीचन्द्रमणि जी पर रहा।

श्री कृतराम जी के पांचों पुत्रों की क्रमवार अलग-अलग वंशावली तथा प्रत्येक परिवार के सदस्यों के विषय में ज्ञात / प्राप्त संक्षिप्त जानकारी आगे दी जा रही है।
श्री कृतराम जी के पांच पुत्र :-
  • श्री देवराम जी
  • श्री दत्तराम जी
  • श्री लोकमणि जी
  • श्री चन्द्रमणि जी
  • श्री उपेन्द्र दत्त जी
🗻 भौगोलिक विशेषताएँ:
यह एक विशुद्ध पहाड़ी ग्राम है, जहाँ प्रकृति ने अपनी भव्यता को विविध रूपों में उकेरा है। गाँव के आसपास उठते कुछ ऊँचे पर्वतीय शिखर इसकी प्राकृतिक संरचना को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं, मानो वे प्रहरी बनकर इस रमणीय स्थल की गरिमा की रक्षा कर रहे हों। यहाँ के निवासी विभिन्न जातियों एवं समुदायों से संबंधित हैं, जिसके परिणामस्वरूप इस ग्राम की सांस्कृतिक संरचना अत्यंत समृद्ध एवं बहुरंगी स्वरूप धारण करती है। विविध परंपराएँ, रीति-रिवाज और जीवन-शैलियाँ मिलकर यहाँ एक ऐसे सामाजिक समन्वय का सृजन करती हैं, जो एकता में विविधता की सुंदर मिसाल प्रस्तुत करता है।


🌲 वन्य जीवन और पारिस्थितिकी – झुरंगु की प्राकृतिक संपदा

झुरंगु गांव, यद्यपि का प्रत्यक्ष भाग नहीं है, तथापि यह उसके समीप स्थित बफर ज़ोन में अवस्थित है। यह बफर क्षेत्र उस मुख्य अभयारण्य (कोर ज़ोन) का परिधीय विस्तार होता है, जहाँ सीमित मानवीय गतिविधियों के साथ-साथ वन्य जीवन अपनी स्वाभाविक लय में विद्यमान रहता है। इस प्रकार झुरंगु, मानव और प्रकृति के संतुलित सह-अस्तित्व का एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है।

यहाँ का वन्य परिवेश अत्यंत समृद्ध एवं विविधतापूर्ण है। घने वनों और पहाड़ी ढलानों के मध्य अनेक प्रकार के जीव-जंतु स्वतंत्र रूप से विचरण करते हैं, जो इस क्षेत्र की जैव-विविधता को अद्वितीय बनाते हैं।

🦌 यहाँ पाए जाने वाले प्रमुख वन्यजीव:

  • चीतल (हिरन) – जिनकी कोमल चाल और झुंडों में विचरण प्रकृति की लय को जीवंत कर देते हैं।
  • सांभर – गहन वनों की निस्तब्धता में अपनी उपस्थिति दर्ज कराता एक विशाल हिरन।
  • हिमालयी बकरी – दुर्गम शिखरों पर सहजता से विचरण करने वाली अद्भुत प्राणी।
  • भालू – वन की गहराइयों का शांत किंतु प्रभावशाली निवासी।
  • मोर – अपनी रंग-बिरंगी छटा से प्रकृति में सौंदर्य का संचार करता हुआ।
  • जंगली मुर्गी – वनों की भोर को अपनी ध्वनि से जागृत करती हुई।
  • गुलदार (तेंदुआ) – छायाओं में विलीन रहकर अपनी उपस्थिति का आभास कराता हुआ चपल शिकारी।
  • हाथी – विशालकाय और सामूहिक जीवन का प्रतीक, जो वन की गरिमा को और बढ़ाता है।
  • लोमड़ी, खरगोश एवं जंगली सूअर – वन्य जीवन की विविधता को संतुलित बनाए रखने वाले जीव।
  • बाघ – वन का गौरव, जिसकी उपस्थिति इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी की समृद्धि का द्योतक है।
  • तेंदुआ – तीव्र गति और कुशलता का अद्वितीय उदाहरण।
  • विविध पक्षी प्रजातियाँ – यहाँ सौ से अधिक पक्षियों की प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जो आकाश को अपने मधुर कलरव से गुंजायमान कर देती हैं।

इस प्रकार झुरंगु का वन्य जीवन केवल प्राकृतिक धरोहर ही नहीं, बल्कि उस पारिस्थितिक संतुलन का प्रतीक है, जिसमें प्रत्येक जीव का अपना एक विशेष स्थान और महत्व है। यहाँ प्रकृति अपने पूर्ण वैभव में, निसर्ग की अनंत कथाएँ सुनाती प्रतीत होती है।

🌿 प्राकृतिक सौंदर्य:
बफर ज़ोन की सुंदरता घास के मैदानों (grasslands), घने जंगलों (dense forests) और पहाड़ियों से मिलकर बनी है।
यह क्षेत्र खासकर उन लोगों के लिए आदर्श है जो वन्यजीवन और प्रकृति से प्रेम करते हैं।

✨ कुल मिलाकर, झुरंगु एक ऐसा गांव है जहाँ प्राकृतिक सौंदर्य, शांत वातावरण और समृद्ध पारंपरिक जीवनशैली का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यह स्थान न केवल पर्यटकों और प्रकृति प्रेमियों के लिए खास है, बल्कि यह सांस्कृतिक और पारंपरिक रूप से भी एक महत्वपूर्ण गांव है

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🌿 झुरंगु गांव – प्रकृति की गोद में बसा एक नन्हा स्वर्ग 


🌿 झुरंगु गांव – प्रकृति की गोद में बसा एक नन्हा स्वर्ग 🌿
झुरंगु एक छोटा लेकिन अत्यंत सुंदर गांव है, जो उत्तराखंड में कॉर्बेट नेशनल पार्क की सीमा पर स्थित है। यह गांव हिमालय की शिवालिक पर्वतमाला की तलहटी में बसा हुआ है और पार्क के बफर ज़ोन का हिस्सा है। चारों ओर घने जंगल, हरियाली से ढके पहाड़ और उपजाऊ खेतों से घिरा यह गांव प्राकृतिक सौंदर्य और पारंपरिक गढ़वाली जीवनशैली का अद्भुत मेल प्रस्तुत करता है।

भौगोलिक स्थिति:

झुरंगु गांव हल्दूखाल से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पहले गांव तक पहुँचने के लिए जंगलों से होकर पैदल जाना पड़ता था, लेकिन अब पक्की सड़क मार्ग बन जाने के कारण यह सफर काफी सुगम हो गया है। गांव से सबसे नजदीकी बाज़ार हल्दूखाल है, जो इस क्षेत्र का मुख्य व्यापारिक केंद्र है। झुरंगु का प्रशासनिक ब्लॉक नैनीडांडा है, जो हल्दूखाल से लगभग 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

🚗 सड़क मार्ग और विकास:

 पूर्व प्रधान श्री पीताम्बर दत्त भदूला जी ने अपने कार्यकाल में समस्त ग्रामवासियों के सक्रिय सहयोग से बुड़ाकोट से झुरंगु तक एक पर्याप्त चौड़ाई वाला पैदल मार्ग/सड़क का निर्माण कराया था। यह मार्ग न केवल सुव्यवस्थित एवं मजबूत था, बल्कि इतना सक्षम भी था कि उस पर टैक्सी जैसे वाहनों का आवागमन संभव हो सका। यही मार्ग आगे चलकर गांव तक सड़क पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार सिद्ध हुआ।

यदि उस समय इस प्रकार का चौड़ा एवं उपयुक्त मार्ग निर्मित न किया गया होता, तो वन विभाग के कड़े नियमों एवं मार्ग में स्थित पेड़ों के कारण सड़क निर्माण हेतु स्वीकृति प्राप्त करना अत्यंत कठिन, लगभग असंभव हो सकता था।

वर्तमान में इस मार्ग के कारण ग्रामीण अपनी निजी गाड़ियों अथवा टैक्सी से सरलता एवं सुविधा के साथ हल्दूखाल तक आवागमन कर पा रहे हैं। तथापि, अभी भी मार्ग का समुचित विस्तार कर इसे ट्रक एवं बसों के संचालन योग्य बनाना आवश्यक है, ताकि क्षेत्र के विकास को और अधिक गति मिल सके।

Jhurangu 

👥 सामाजिक संरचना:

गांव में भदूला, कुकरेती, सेमवाल, शिल्पकार लोग सहित कई अन्य जातियों के लोग मिलजुलकर सदियों से निवास करते आ रहे है।

हालांकि आधुनिक जीवन की आवश्यकताओं के चलते गांव के कई लोग देश के अलग-अलग शहरों में रोजगार, शिक्षा व व्यवसाय हेतु बस गए हैं, लेकिन उनका मन आज भी अपने गांव से गहराई से जुड़ा हुआ है।

🌲 प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यावरण:

झुरंगु, कॉर्बेट नेशनल पार्क के बफर ज़ोन में होने के कारण वन्य जीवन और जैव विविधता में समृद्ध है।

यहां आसपास के जंगलों में चीतल, सांभर, तेंदुआ, बाघ, हिमालयी बकरी और विभिन्न पक्षियों की प्रजातियाँ देखी जा सकती हैं। वर्तमान में हाथियों का झुण्ड भी गांव तक पहुंचने लगा है।

चारों ओर फैली हरियाली, बंजर खेत, घने जंगल और शांत वातावरण इसे एक आदर्श प्राकृतिक स्थल बनाते हैं।

📜 निष्कर्ष:

झुरंगु सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि यह गढ़वाल की मिट्टी से जुड़ा हुआ एक गौरवशाली प्रतीक है। यहां की संस्कृति, प्राकृतिक सौंदर्य और लोगों की मेहनत मिलकर इस स्थान को एक आदर्श ग्रामीण मॉडल बनाते हैं। आज जब गांव सड़क, बिजली और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं से जुड़ रहा है, तब इसके विकास में योगदान देने वाले सभी लोगों को सादर नमन।

हालांकि यह गांव पहले काफी दूरस्थ और दुर्गम था, लेकिन अब यहां सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाएं धीरे-धीरे विकसित हो चुकी हैं।



Village Jhurangu via HALDUKHAL 

झुरंगु ग्राम अपनी प्राकृतिक रमणीयता के साथ-साथ गहन आस्था और आध्यात्मिक परंपराओं का भी केंद्र है। यहाँ अनेक  मंदिर स्थित हैं, जो ग्रामवासियों की श्रद्धा और विश्वास के प्रतीक हैं। इन मंदिरों में नृसिंह देवता, बद्रीनाथ देवता, भूमिया देवता, सिद्ध देवता, सुजान देवता तथा कालिंका देवी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
ग्राम के सभी लोग आपसी सौहार्द और एकता के साथ अपने-अपने इष्ट देवताओं की पूजा करते हैं। पर्व-त्योहारों एवं विशेष अवसरों पर संपूर्ण गांव एकत्रित होकर भक्ति और श्रद्धा के वातावरण में लीन हो जाता है। यह सामूहिक उपासना न केवल धार्मिक आस्था को सुदृढ़ करती है, बल्कि ग्राम की सामाजिक एकता और पारंपरिक मूल्यों को भी जीवंत बनाए रखती है।

           Badrinath Ji Ka mandir

Mandal river, maidaban
 
पाठको से निवेदन: प्रिय दोस्तो, यह मेरा हिन्दी में पहला लेख है। हम उत्तर भारतीयों के लिये हिन्दी बोलना जितना आसान है, कम्प्यूटर पर लिखना उतना ही मुश्किल। स्वभाविक है व्याकरण की काफ़ी गलतियॉ होगीं, कृप्या नजर-अदांज न करें, टिप्पणी अवश्य करें जिससे भविष्य के लिये मदद मिल सके। 
समय की बहती धारा एव आधुनिकीकरण की दौर मे हम लोग भी अपनी संस्कृति को खोते जा रहे है ! आने वाली पीड़ी एक अपनी संस्कृति को खोज भी नही पायेगी क्योकि इतिनी तेजी से यदि हमारा संस्कृति बदलती रही तो इसका अस्तित्व ढूदना मुश्किल हो जायगा. !
उतराखंड सौंदर्य का जीवन्त प्रतीक है, सरलता एवं गरिमा का अभिषेक है और सभ्यता एवं संस्कृति इसकी विशिष्ट पहचान है। यहाँ प्रकृति और जीवन के बीच ऐसा सामंजस्य हैं जो सभी पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को मंत्रमुग्ध कर देता है। यहाँ की शीतल हवा शान्ति की प्रतीक हैं तो फलदार वृक्ष दान की महिमा का गुणगान करते हैं। यहाँ के लोक जीवन में परंपराएँ, खेल-तमाशे, मेले, उत्सव, पर्व-त्यौहार, चौफुला-झुमैलो, दैरी-चांचरी, छपेली, झौड़ो के झमाके, खुदेड़ गीत, ॠतुरैण, पाण्डव-नृत्य, संस्कार सभी कुछ अपने निराले अन्दाज में जीवन को सजाते हैं।
अगर आप प्रकृति प्रेमी हैं तो आप को हर चीज़ में सुंदरता नज़र आएगी- प्रकृति प्रेमी 



Mandal river 


Comments

  1. Are you related with late sri chintamani bhadula

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  2. आपने इस विषय पर एक बेहतरीन लेख लिखा है, मैं बहुत प्रभावित हुआ। मेरा यह लेख भी पढ़ें मां कालिंका मंदिर

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