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Jhurangu, Pauri Garhwal, Uttarakhand- Mr. Amit Bhadula

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My Village Jhurangu (झुड़ंगू) 🕊️  **************** ग्राम झुडगू ,पोस्ट ऑफिस चामसैन विकासखंड NAINIDANDA तहसील धुमाकोट पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड  Village Jhurangu PO CHAMSAIN BLOCK NAINIDANDA TEHSIL-DHUMAKOT district Pauri Garhwal Uttarakhand  🌿 यह स्मृति-लेख हमारे परिवार की पहचान, मूल्य और परंपरा का जीवित दस्तावेज़ है।   🌿 📍 झुरंगु गांव –  झुरंगु गांव – प्रकृति की गोद में बसा एक अनुपम लोक, शिवालिक पहाड़ियों के मध्य, बूंगी मां के छत्र छाया में बसा झुरंगु एक ऐसा गांव है मानो प्रकृति ने अपनी कोमल भावनाओं को आकार देकर उसे धरती पर उतार दिया हो। चारों ओर फैले घने वन, लंबे चौड़े खेत, हरियाली से लिपटी ढलानें और शीतल हवाओं की सरसराहट यहां के वातावरण को जीवंत बना देती हैं। प्रातःकाल जब सूर्य की प्रथम किरणें पर्वतों के आंचल से झांकती हैं, तो पूरा गांव स्वर्णिम आभा में नहा उठता है। पक्षियों का मधुर कलरव, पेड़ों की मद्धिम थिरकन और दूर तक पसरी निस्तब्धता—ये सब मिलकर झुरंगु को एक अद्वितीय संगीत प्रदान करते हैं। यह गांव केवल एक स्थान नहीं, बल्कि सरलता, शांति और परंपर...

Jhurangu pauri Garhwal Uttarakhand

 मेरा #गांव अब उदास रहता है.. ✍️ लड़के जितने भी थे मेरे गांव में। जो बैठते थे दोपहर  की छांव में। बड़ी रौनक हुआ करती थी जिनसे घर में  वो सब के सब चले गए शहर में। ऐसा नही कि रहने को मकान नही था। बस यहां रोटी का इंतजाम नहीं था। हास परिहास का आम तौर पर उपवास रहता है। मेरा #गांव अब उदास रहता है।। बाबू जी ठंड में सिकुड़े और पसीने मे नहाए थे। तब जाकर तीन कमरे किसी तरह बनवाए थे। अब तीनों कमरे खाली हैं मैदान बेजान है। छतें अकेली हैं गलियां वीरान हैं।। मां का शरीर भी अब घुटनों पर भारी है। पिता को हार्ट और डाईविटीज की बीमारी है। अपने ही घर में मां बाप का वनवास रहता है। मेरा #गांव अब उदास रहता है।। छत से बतियाते पंखे, दीवारें और जाले हैं। कुछ मकानों पर तो कई वर्षों से तालें हैं।। बेटियों को ब्याह दिया गया ससुराल चली गई। दीवाली की छुरछुरी होली का गुलाल चली गई। मोहल्ले मे जाओ जरा झांको कपाट पर। बैठे मिलेंगे अकेले बाबू जी, किसी कुर्सी किसी खाट पर।। सावन के झूले उतर गए भादों भी निराश रहता है। मेरा #गांव अब उदास रहता है।। कबड्डी क्रिकेट अंताक्षरी, सब वक्त की तह में दब गए। हमारे गांव के ल...

उत्तराखंड से पलायन मजबूरी

उत्तराखंड से पलायन मजबूरी महानगरीय चकाचौंध तले    हमारे देश का एक बड़ा तबका बड़े शहरों में अपना जीवन ज्यादा   सुखी देखता   है उत्तराखंड की हमारी आज की  नौजवान    पीड़ी  अपने गावो से लगातार कटती जा रही है ।रोजी रोटी की तलाश में घर से  निकला यहाँ का नौजवान    अपने बुजुर्गो की सुध इस दौर में नहीं ले पा रहा है ।यहाँ के गावो में आज बुजुर्गो की अंतिम पीड़ी रह रही है और कई मकान बुजुर्गो के निधन के बाद सूने हो गए हैं ।आज आलम यह है दशहरा  , दीपावली  , होली सरीखे त्यौहार भी इन इलाको में उस उत्साह के साथ नहीं मनाये जाते जो उत्साह बरसो पहले  संयुक्त   परिवार के साथ देखने को मिलता था । हालात    कितने खराब हो चुके हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है आज पहाड़ो में लोगो ने खेतीबाड़ी   जहाँ छोड़ दी है वहीँ पशुपालन भी इस दौर में घाटे का सौदा बन गया है क्युकि वन सम्पदा लगातार    सिकुड़ती जा रही है और माफियाओ , कारपोरेट    और सरकार का काकटेल    पहाड़ो की सुन्दरता पर ग्रहण ...